उत्तर बस्तर कांकेर, 06 जुलाई 2026।
छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के तत्वावधान में सोमवार को सिंगारभाट स्थित नीलम कक्ष (काष्ठागार डिपो) में जिला स्तरीय वैद्य सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। सम्मेलन में जिले के तीनों वनमंडलों के अंतर्गत आने वाले सभी सात विकासखंडों से बड़ी संख्या में पारंपरिक वैद्य, वन विभाग के अधिकारी एवं औषधीय पौधों के संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ उपस्थित रहे। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धति, औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण, वैद्यों के अनुभवों के आदान-प्रदान तथा शासन की योजनाओं से अधिकाधिक लोगों को जोड़ना रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने अपने संबोधन में कहा कि प्रदेश की समृद्ध पारंपरिक चिकित्सा पद्धति हमारी सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे संरक्षित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक वैद्य वर्षों से निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा कर रहे हैं। जड़ी-बूटियों के माध्यम से उपचार करने के साथ-साथ वे दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण और उनके संवर्धन में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ को “हर्बल स्टेट” के रूप में विकसित करने की दिशा में पारंपरिक वैद्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्री मरकाम ने सभी पारंपरिक वैद्यों से औषधि पादप बोर्ड में अपना पंजीयन कराने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे उन्हें शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ प्राप्त होगा तथा औषधीय पौधों के माध्यम से आजीविका के नए अवसर भी विकसित होंगे। उन्होंने विद्यालयों में हर्बल गार्डन, औषधीय उद्यान तथा दुर्लभ औषधीय प्रजातियों के संरक्षण को बढ़ावा देने पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने जानकारी दी कि प्रदेश में अब तक लगभग 1,300 पारंपरिक वैद्यों का पंजीयन किया जा चुका है। इस अवसर पर उन्होंने *पद्मश्री से सम्मानित नारायणपुर के प्रसिद्ध पारंपरिक वैद्य श्री हेमचंद मांझी के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन समाज सेवा और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए औषधि पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री अंजय शुक्ला ने कहा कि औषधीय जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक ढंग से संग्रहण, संरक्षण और सुरक्षित भंडारण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि विशेषकर वर्षा ऋतु में औषधीय सामग्री के खराब होने की संभावना अधिक रहती है, इसलिए उनके संरक्षण के आधुनिक उपाय अपनाने चाहिए। उन्होंने दुर्लभ औषधीय पौधों के संवर्धन तथा उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
औषधि पादप बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री जे.ए.सी.एस. राव ने कहा कि पारंपरिक वैद्य समाज की अमूल्य धरोहर हैं और उनका ज्ञान आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि बोर्ड द्वारा जड़ी-बूटियों की प्रोसेसिंग के लिए चूर्ण बनाने, पीसने एवं तरल औषधि तैयार करने वाली मशीनें उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। इच्छुक वैद्य अपने क्षेत्र में इन मशीनों की स्थापना कर स्थानीय स्तर पर औषधीय उत्पाद तैयार कर सकेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि स्कूल हर्बल गार्डन एवं दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए शासन द्वारा आर्थिक सहायता एवं प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
सम्मेलन के दौरान जिले के विभिन्न ग्रामों से आए पारंपरिक वैद्यों ने जड़ी-बूटियों की पहचान, उनके औषधीय गुण, संग्रहण की पारंपरिक विधियों, संरक्षण के उपायों तथा विभिन्न रोगों के उपचार संबंधी अपने अनुभव साझा किए। इस ज्ञान-विनिमय से पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ बनाने तथा भावी पीढ़ी तक इस अमूल्य विरासत को सुरक्षित पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई।
कार्यक्रम में वनमंडलाधिकारी श्री रौनक गोयल, वैद्य संघ के अध्यक्ष श्री वीर सिंह पद्दा, वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी तथा जिले के सभी विकासखंडों से आए बड़ी संख्या में पारंपरिक वैद्य उपस्थित रहे। सम्मेलन का समापन पारंपरिक औषधीय ज्ञान के संरक्षण, औषधीय पौधों के संवर्धन तथा जनस्वास्थ्य की बेहतरी के लिए सामूहिक प्रयासों के संकल्प के साथ हुआ।
