डॉ. नरेश गौतम
समाजकार्य विभाग
भारत के इतिहास में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने सत्ता से नहीं, बल्कि समाज की सोच से लड़ाई लड़ी। कबीर उन्हीं विरले लोगों में थे। लगभग पाँच सौ वर्ष पहले, जब समाज जाति, छुआछूत, ऊँच-नीच और धार्मिक कट्टरता में बँटा हुआ था, तब एक साधारण जुलाहा पूरे समाज से सवाल पूछ रहा था। उसके पास न कोई सेना थी, न कोई राजसत्ता और न ही कोई धार्मिक संस्था। उसके पास केवल सच बोलने का साहस था। वह कहते हैं “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”
आज जब हम संविधान, समानता और वैज्ञानिक सोच की बात करते हैं, तब यह याद रखना चाहिए कि इन मूल्यों की आवाज़ कबीर सदियों पहले उठा चुके थे। इसलिए कबीर केवल इतिहास नहीं हैं, वे आज के भारत की भी ज़रूरत हैं। कबीर को अक्सर केवल एक संत या कवि मान लिया जाता है, जबकि वे अपने समय के सबसे बड़े सामाजिक आलोचक, चिंतक और समाज सुधारक थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों समाजों से असहज सवाल पूछे। उन्होंने किसी धर्म का विरोध नहीं किया, बल्कि धर्म के नाम पर फैले दिखावे, अंधविश्वास और पाखंड का घोर विरोध किया।
“पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार॥”
यह दोहा केवल मूर्ति पूजा की आलोचना नहीं है। यह श्रम, उपयोगिता और समाज के लिए काम आने वाली चीज़ों का सम्मान है। कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर का उपयोग करना ही है, तो उसे ऐसी चक्की बनाओ जो लोगों का पेट भरे। यह सोच अंधविश्वास नहीं, बल्कि तर्क और उपयोगिता की सोच है। आज जिसे हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं, उसकी झलक कबीर की वाणी में साफ दिखाई देती है।
“कांकर पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥”
उनका सवाल सीधा था क्या ईश्वर को ऊँची आवाज़ में पुकारने की ज़रूरत है? अगर ईश्वर हर जगह है, तो फिर दिखावे का क्या अर्थ है? आज भी यह प्रश्न उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि धर्म के नाम पर शोर बढ़ा है, लेकिन इंसानियत की आवाज़ अक्सर धीमी पड़ जाती है।
कबीर यहीं नहीं रुके उन्होंने जाति व्यवस्था पर गहरा प्रश्न किया
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।”
यह केवल एक दोहा नहीं था, बल्कि उस दौर की पूरी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह था। कबीर ने कहा कि इंसान बड़ा अपने कर्म और ज्ञान से होता है, जन्म से नहीं। पाँच सौ साल बाद आज भी यह सवाल हमारे सामने खड़ा है। वर्तमान भारतीय संरचना में जाति को लेकर कुछ नहीं बदला है बस जातिवादी संरचना का स्वरूप जरूर बदल गया है, सामाजिक भेदभाव कमोवेश उसी तरह बरकरार है और बल्कि हमारे समाज मेन बहुत से उदाहरण आज भी मिल जाते हैं जहाँ इंसानों का सम्मान उनकी योग्यता से नहीं, बल्कि उनकी जाति से तय किया जाता है। कबीर आज भी उसी पदानुक्रमिक सामाजिक संरचना से लड़ रहे हैं। कबीर का जीवन ही उनका सबसे बड़ा संदेश था। वे स्वयं जुलाहे थे। उन्होंने मेहनत को पूजा माना और कभी भीख या चमत्कार का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने अपने हाथों से काम किया और समाज को बताया कि श्रम ही सबसे बड़ा धर्म है। उनकी चक्की केवल एक प्रतीक नहीं है। वह उत्पादन, श्रम और उपयोगिता का दर्शन है। आज जब देश ‘स्किल इंडिया’, स्टार्टअप, आत्मनिर्भर भारत और रोज़गार सृजन की बात कर रहा है, तब कबीर का संदेश और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। वे हमें बताते हैं कि समाज की असली ताकत पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि मेहनत करने वाले हाथों में बसती है। आज हमारे पास इंटरनेट है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) है, आधुनिक विज्ञान है और दुनिया की सबसे तेज़ तकनीकें हैं। लेकिन दूसरी ओर नफरत भी पहले से तेज़ी से फैल रही है। सोशल मीडिया पर अफवाहें सच से ज़्यादा तेज़ दौड़ती हैं। धर्म के नाम पर आज भी हत्याएँ बलात्कार होते हैं। ऐसे समय में कबीर हमें फिर याद दिलाते हैं कि धर्म का उद्देश्य इंसान को जोड़ना है, बाँटना नहीं। आस्था का अर्थ विवेक खो देना नहीं बल्कि सबसे बड़ा धर्म इंसान को इंसान समझना उसे सम्मान देना है . अगर कबीर आज होते, तो शायद फिर वही सवाल पूछते- क्या धर्म हमें बेहतर इंसान बना रहा है?, क्या जाति आज भी हमारी पहचान बनी हुई है?, क्या हम सच में सोच रहे हैं, या केवल भीड़ का हिस्सा बन गए हैं? कबीर के दोहे हमें स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं, मंचों पर पढ़े जाते हैं और नेताओं के भाषणों में सुनाई देते हैं। लेकिन अगर समाज में जाति बनी हैं, असमानता बरकरार है, धार्मिक नफरत अपने चरम पर है और अंधविश्वास पहले से कहीं अधिक फल फूल रहा है, तो इसका मतलब है कि हमने कबीर को केवल याद किया है, समझा कभी नहीं। कबीर किसी एक धर्म, जाति या समुदाय के संत नहीं थे। वे भारत की उस साझा संस्कृति की आवाज़ थे जहाँ इंसान पहले है और पहचान बाद में। इसलिए कबीर आधुनिक भारत में अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं क्योंकि सवाल पूछना विद्रोह नहीं, समाज को बेहतर बनाने की पहली शर्त है।
