‘सतलुज’ इतिहास में दफन सच, सत्ता की हिंसा और स्मृति के प्रतिरोध की फिल्म


डॉ. नरेश गौतम
सहायक प्राध्यापक
किसी भी समाज का सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है, जब इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा जाने लगता है और मृतकों की आवाज़ को भी सत्ता अपने हिसाब से तय करने लगती है। ‘सतलुज’ ऐसी ही फिल्म है, जो उस दौर के पंजाब की सबसे भयावह त्रासदियों में से एक को पर्दे पर लाने का साहस करती है। यही कारण है कि यह फिल्म 3 जुलाई को ओटीटी पर रिलीज़ हुई और महज़ दो दिन बाद, 5 जुलाई को ओटीटी से हटा दी गई। किसी फिल्म का इतनी जल्दी गायब हो जाना केवल एक तकनीकी घटना नहीं, बल्कि यह भी सवाल है कि आखिर ऐसी कौन-सी बेचैनी थी, जिससे कुछ लोग इतने असहज हो उठे? यह कहानी केवल पंजाब के उग्रवाद के दौर की कहानी नहीं है बल्कि यह उस दौर के राज्य-सत्ता, पुलिस, प्रशासन और आम नागरिक के बीच टूटते विश्वास की कहानी है। यह बताती है कि जब सत्ता अपने अस्तित्व को बचाने या अपनी जीत साबित करने में अंधी हो जाती है, तो वह कानून, न्याय और मानवाधिकारों की सीमाएँ कितनी आसानी से पार कर देती है।
फिल्म की आत्मा का सबसे बड़ा आधार हैं जसवंत सिंह खालड़ा, वह मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियानों के दौरान हजारों अज्ञात और लापता लोगों के गुप्त अंतिम संस्कार का पर्दाफाश किया। उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड, श्मशानों के रजिस्टर और दस्तावेज़ों के आधार पर यह प्रश्न उठाया कि जिन लोगों को अज्ञात बताकर जला दिया गया, वे आखिर थे कौन? उनका अपराध क्या था? उनके परिवार कहाँ थे? यही प्रश्न उन्हें अंततः अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। उनकी हत्या स्वयं इस बात का प्रतीक बन गई कि सच बोलना कई बार सबसे बड़ा अपराध बन जाता है इतिहास में जलियांवाला बाग नरसंहार को ब्रिटिश औपनिवेशिक दमन का सबसे भयावह प्रतीक माना जाता है। लेकिन पंजाब के उग्रवाद काल की त्रासदी का दर्द अलग प्रकार का था। यहाँ आरोप यह रहे कि अपने ही लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर, अपने ही नागरिकों का एक बड़ा वर्ग संदेह, भय और उग्रवाद की व्यापक परिभाषा के बीच पिसता चला गया। हजारों लोग लापता हुए, अनेक कथित फर्जी मुठभेड़ों की कहानियाँ सामने आईं और वर्षों तक अनेक परिवार अपने प्रियजनों का अंतिम सत्य भी नहीं जान सके। इतिहास के वे पन्ने आज भी पूरी तरह पढ़े नहीं गए हैं। वे अब भी सवालों और खूनी स्मृतियों से भरे हुए हैं।
‘सतलुज’ पंजाब पुलिस और बेगुनाह पंजाबियों की मौतों के बीच उलझी हुई उसी डोर को सामने रखती है, जिसका सिरा आज भी पूरी तरह किसी के हाथ में नहीं है। फिल्म किसी एक पक्ष का महिमामंडन नहीं करती, बल्कि उस भय, अविश्वास और हिंसा को चित्रित करती है जिसने पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। फिल्म देखते हुए बार-बार यह विचार आता है कि जिस समय ये घटनाएँ घट रही थीं, उस समय इन पर लिखना ही असाधारण साहस का काम रहा होगा। क्या उस दौर की निरंकुश शक्तियों ने कभी कल्पना की होगी कि एक दिन इन्हीं घटनाओं पर फिल्म बनेगी? कि एक दिन उनके फैसलों, उनके अभियानों और उनके अपराधों पर सार्वजनिक बहस होगी? इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यही है वह देर से बोलता है, लेकिन चुप हमेशा नहीं रहता। आज भी जब कथित मुठभेड़ों, बुलडोज़र राजनीति, राज्य की असाधारण शक्तियों और मानवाधिकारों पर बहस होती है, तब असहमति व्यक्त करना आसान नहीं होता। लेकिन इतिहास गवाही देता है कि कोई भी दौर स्थायी नहीं होता। आज जिन प्रश्नों को दबा दिया जाता है, वही कल शोध, साहित्य, सिनेमा और जनस्मृति का विषय बनते हैं। सत्ता का हर निर्णय इतिहास में उसी रूप में दर्ज नहीं होता, जैसा वह स्वयं चाहती है। कहा जाता है कि लाशें कभी झूठ नहीं बोलतीं। कोई भी शव वास्तव में लावारिस नहीं होता, क्योंकि समय स्वयं हर मृतक का सबसे बड़ा वारिस होता है। देर-सबेर सच दस्तावेज़ों, स्मृतियों, गवाहियों के माध्यम से लौटता है। जो लोग आज अन्याय को न्याय समझते हैं, इतिहास अक्सर उन्हें अलग कतार में खड़ा करता है। इसी अर्थ में ‘सतलुज’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि स्मृति का प्रतिरोध है। यह हमें याद दिलाती है कि शांति यदि न्याय के बिना स्थापित की जाए, तो वह केवल भय का दूसरा नाम होती है। किसी भी लोकतंत्र में कानून का शासन तभी सार्थक है, जब वह निर्दोषों की रक्षा करे, यदि कानून स्वयं भय का औजार बन जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा ख़त्म हो जाती है।
फिल्म पर प्रतिबंध लगना भी अपने आप में कई प्रश्न खड़े करता है। किसी रचना से असहमति हो सकती है, उसके तथ्यों पर बहस हो सकती है, उसकी व्याख्या पर आलोचना हो सकती है, लेकिन किसी फिल्म को सार्वजनिक विमर्श से हटाना अक्सर जिज्ञासा और संदेह दोनों को और बढ़ा देता है। विचारों का उत्तर प्रतिबंध नहीं, बल्कि तर्क, शोध और खुली बहस होना चाहिए। इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली पक्ष इसका अभिनय, निर्देशन और वातावरण रचना है। कैमरा केवल दृश्य नहीं दिखाता, बल्कि भय, खामोशी और असुरक्षा का मनोविज्ञान भी रचता है। जसवंत सिंह खालड़ा जैसे चरित्रों की स्मृति फिर जीवित हो उठती है और वे प्रश्न दोबारा हमारे सामने खड़े हो जाते हैं, जिन्हें इतिहास ने सुविधानुसार पीछे धकेल दिया था। इतिहास का अनुभव केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। दुनिया के लगभग हर समाज में ऐसे दौर आए हैं, जब राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास गहरे स्तर पर टूट गया। समय बीतने के बाद उन्हीं घटनाओं पर किताबें लिखी गईं न्यायिक आयोग बने, दस्तावेज़ सार्वजनिक हुए और फिल्में बनीं। इसलिए यह मान लेना कि कोई सच हमेशा के लिए दफन रह जाएगा, इतिहास को न समझने जैस है। ‘सतलुज’ हमें एक असुविधाजनक लेकिन अत्यंत आवश्यक प्रश्न पूछने के लिए विवश करती है क्या शांति के नाम पर किया गया अन्याय वास्तव में शांति ला सकता है? उत्तर शायद नहीं है। क्योंकि अन्याय कभी स्थायी शांति की नींव नहीं बन सकता। भय से कुछ समय के लिए सन्नाटा तो स्थापित किया जा सकता है, लेकिन न्याय के बिना स्थायी शांति संभव नहीं होती। न्याय में देर हो सकती है, लेकिन स्मृतियों को कभी मिटाया नहीं जा सकता। पंजाब की त्रासदी अपने समय और परिस्थितियों में वीभत्स थी, लेकिन उसके उठाए गए प्रश्न केवल पंजाब तक सीमित रहते हैं बल्कि आज भी जब हम देश के विभिन्न हिस्सों की ओर देखते हैं, तो राज्य, सुरक्षा, मानवाधिकार और न्याय के वही कठिन प्रश्न हमारे सामने खड़े दिखाई देते हैं। नक्सलवाद या माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा अन्य राज्यों में दशकों से सुरक्षा अभियानों और मानवाधिकारों के बीच संतुलन को लेकर गंभीर बहस होती रही है। अलग-अलग समय पर फर्जी मुठभेड़ों, हिरासत में मौतों, लापता व्यक्तियों और निर्दोष नागरिकों के प्रभावित होने जैसे आरोप भी सामने आते रहे हैं। यही बात उत्तर-पूर्व, विशेषकर मणिपुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर भी लागू होती है, जहाँ हिंसा, असुरक्षा और प्रशासनिक विफलताओं ने अनेक कठिन प्रश्न खड़े किए हैं। घटनाओं के स्वरूप अलग हो सकते हैं, परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में मूल प्रश्न वही रहता है क्या कानून के शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना न्याय संभव है? ‘सतलुज’ फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह किसी एक घटना का पुनर्निर्माण भर नहीं करती, बल्कि हमारे समय से भी संवाद करती है। वह हमें याद दिलाती है कि जब राज्य की शक्ति असाधारण हो जाती है, तब उसके साथ असाधारण जवाबदेही भी आवश्यक होती है। अन्यथा इतिहास बार-बार उन्हीं सवालों के साथ लौटता है। निर्देशक हनी तेहरान ने इस विषय को पर्दे पर लाकर उल्लेखनीय साहस का परिचय दिया है। जिस विषय पर दशकों तक खामोशी, भय और विवाद का माहौल बना रहा हो, उसे सिनेमा के माध्यम से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाना आसान नहीं होता। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में ऐसी फिल्मों का मूल्य केवल उनकी सिनेमाई गुणवत्ता से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि वे हमें इतिहास के कठिन प्रश्नों का सामना करने का साहस देती हैं। क्योंकि इतिहास को भुला देने से इतिहास समाप्त नहीं होता वह स्मृतियों, दस्तावेज़ों और कला के माध्यम से बार-बार लौटता है।

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