लोकसंस्कृति की अमर स्वर-यात्रा- तिजन बाई की विरासत और हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी


डॉ. नरेश गौतम
शिक्षाविद
“कलाकार कभी नहीं मरते, वे अपनी कला में जीवित रहते हैं।” यह पंक्ति यदि किसी लोक कलाकार पर सबसे अधिक सटीक बैठती है, तो वह हैं तिजन बाई। 5 जुलाई 2026 को लंबी बीमारी से संघर्ष करते हुए उन्होंने अंतिम साँस ली। उनके निधन के साथ भारतीय लोक संस्कृति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ, जिसने कई दशकों से अधिक समय तक भारत की लोक परंपराओं को विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया। उन्हें 5 जुलाई 2026 को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। यह सम्मान केवल एक कलाकार को नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना को समर्पित था, जिसकी वे आजीवन प्रतिनिधि रहीं। भारत की आत्मा उसकी लोक संस्कृति में बसती है। देश की विविध भाषाएँ, लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाएँ और लोकनाट्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति एवं सामूहिक चेतना का स्रोत हैं। इन्हीं परंपराओं ने भारत को सांस्कृतिक रूप से विश्व में विशिष्ट पहचान दिलाई है। छत्तीसगढ़ की धरती से निकली पंडवानी इसी समृद्ध विरासत की एक अनमोल धरोहर है। यदि आज दुनिया इस लोकगायन शैली को जानती है और सम्मान देती है, तो उसका सबसे बड़ा श्रेय तिजन बाई को जाता है। अत्यंत साधारण परिवार में जन्मी तिजन बाई के पास न उच्च शिक्षा थी और न संसाधनों का वैभव। औपचारिक शिक्षा लगभग न के बराबर थी, लेकिन उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा की सबसे बड़ी पाठशाला जीवन का संघर्ष और निरंतर अभ्यास होता है। उन्होंने कभी अपनी परिस्थितियों को अपनी सीमाएँ नहीं बनने दिया। यही कारण है कि उनका जीवन केवल एक कलाकार की जीवनी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का जीवंत दस्तावेज है।
उनकी लोकप्रियता का सबसे अनूठा उदाहरण वह समय था, जब विदेशों से आने वाली चिट्ठियों पर केवल “Teejan Bai, India” लिखा होता था और वे बिना किसी कठिनाई के उनके पास पहुँच जाती थीं। यह किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक की पहचान थी। यह सम्मान न प्रचार से मिला था, न किसी अभियान से, बल्कि दशकों की कठिन साधना, अद्वितीय प्रस्तुति और कला के प्रति पूर्ण समर्पण से अर्जित हुआ था।
तिजन बाई ने केवल पंडवानी नहीं गाई, उन्होंने उसे जीया है। उनकी प्रस्तुति में महाभारत केवल कथा नहीं रह जाती थी, बल्कि मंच पर जीवित हो उठती थी। भीम का पराक्रम, अर्जुन का आत्मविश्वास, द्रौपदी का स्वाभिमान और कृष्ण की नीति सब कुछ उनकी आवाज़, अभिनय और भावभंगिमा के माध्यम से दर्शकों के सामने साकार हो जाता था। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुति भाषा की सीमाओं को पार कर जाती थी। कला का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सार्वभौमिकता होती है। वह शब्दों से परे जाकर भावों में संवाद करती है। तिजन बाई ने दुनिया के अनेक देशों में प्रस्तुतियाँ दी, जहाँ अधिकांश दर्शक न हिंदी जानते थे और न छत्तीसगढ़ी। फिर भी उनकी प्रस्तुति समाप्त होते ही सभागार तालियों से गूँज उठते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि सच्ची कला को भाषा की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि संवाद, भाव, शैली और संवेदना स्वयं उसकी भाषा बन जाती है।
उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए पंडवानी की ‘कापालिक’ शैली में ऐसी प्रभावशाली मंचीय प्रस्तुतियाँ दीं, जिसे लंबे समय तक पुरुष कलाकारों का क्षेत्र माना जाता था। अपनी बुलंद आवाज़, ओजपूर्ण अभिनय, सशक्त अभिव्यक्ति और अद्वितीय आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने न केवल इस परंपरा में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की, बल्कि यह धारणा भी बदल दी कि कुछ कलाएँ केवल पुरुषों के लिए होती हैं। उनके साहस और साधना ने आने वाली पीढ़ियों की महिला कलाकारों के लिए नए द्वार खोले। तिजन बाई ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि कला में न स्त्री होती है, न पुरुष; वहाँ केवल प्रतिभा, समर्पण और निरंतर साधना का ही महत्व होता है कला केवल समर्पण और उसके लिए की गई साधना को पहचानती है। उनके योगदान का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया। ये सम्मान केवल उनके व्यक्तिगत गौरव के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि भारत की लोक परंपराओं को राष्ट्रीय सम्मान मिलने का भी प्रमाण हैं। उन्होंने यह स्थापित किया कि लोककला किसी शास्त्रीय परंपरा से कम समृद्ध नहीं होती बस उसे बेहतर मंच और सम्मान देने की जरूरत होती है। तिजन बाई का निधन हमें एक और महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है। हम अपनी लोककलाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए कितना प्रयासरत हैं? आज डिजिटल मनोरंजन के दौर में अनेक लोक परंपराएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। यदि समय रहते इनके संरक्षण, दस्तावेजीकरण और संस्थागत संवर्धन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जाएँगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों के सामने यह एक महत्वपूर्ण दायित्व है कि वे लोककलाओं को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अध्ययन, शोध और नवाचार का विषय के तौर पर बढ़ावा देने का प्रयास करें।
5 जुलाई 2026 को तिजन बाई की आवाज़ भले ही मौन हो गई, लेकिन उनकी गूँज आने वाली सदियों तक भारतीय संस्कृति के आकाश में सुनाई देती रहेगी। वे केवल छत्तीसगढ़ की नहीं, पूरे भारत की सांस्कृतिक चेतना की अमर स्वर हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोककला गाँवों की सीमाओं में कैद कोई परंपरा नहीं, बल्कि विश्व को जोड़ने वाली सांस्कृतिक परंपरा और लोक की विरासत है। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनकी विरासत को आगे बढ़ाएँ। अपनी लोकभाषाओं, लोककलाओं और लोक कलाकारों को केवल अतीत की धरोहर न मानें, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक पूँजी समझा जाए। क्योंकि जिस समाज की लोक संस्कृति जीवित रहती है, वही समाज अपनी पहचान, आत्मा और इतिहास को भी जीवित रखता है। लोक कलाएँ सिर्फ परफॉर्मेंस नहीं है बल्कि वह हमारे इतिहास, सामुदायिक संघर्ष और सामाजिक चेतना का जिता जगता उदाहरण होती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!