गांव हो या शहर, हर गली-मोहल्ले में एक ऐसा “महान चिकित्सक” मिल ही जाता है, जिसके पास न कोई मान्यता प्राप्त डिग्री होती है और न ही वैध पंजीकरण, लेकिन आत्मविश्वास ऐसा कि बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी शर्मा जाएं। बुखार से लेकर ऑपरेशन तक, हर बीमारी का इलाज इनके पास मानो जेब में रखा रहता है।
इनकी शिकायतें मंत्री से लेकर विधायक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी तक पहुंचती हैं। शिकायतों की फाइलें भी शायद इलाज के इंतजार में पड़ी रहती हैं, क्योंकि कार्रवाई नाम की दवा आज तक किसी मरीज को नहीं मिली। लगता है व्यवस्था ने भी इन झोलाछाप डॉक्टरों को “स्थायी स्वास्थ्य सेवा” का दर्जा दे दिया है।
दुर्भाग्य यह है कि कई लोगों ने कथित लापरवाही के कारण अपनी जान गंवाई, लेकिन न क्लीनिक बंद हुए और न ही कारोबार। मानो किसी की मौत भी प्रशासन के लिए सिर्फ एक आंकड़ा भर हो।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि बिना योग्यता और अनुमति के कोई व्यक्ति खुलेआम इलाज कर सकता है, तो फिर मेडिकल शिक्षा, लाइसेंस और कानून का महत्व क्या रह जाता है? क्या नियम सिर्फ ईमानदारी से काम करने वालों के लिए हैं?
जब तक जिम्मेदार विभाग केवल शिकायतें सुनने और फाइलें आगे बढ़ाने तक सीमित रहेंगे, तब तक ऐसे कथित झोलाछाप डॉक्टर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करते रहेंगे। जरूरत सिर्फ कार्रवाई की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की है जिसमें किसी मरीज की जान लापरवाही की कीमत न बने।
