पीके शेरपा की चार दशक से अधिक लंबी यात्रा : सजीव एवं निर्जीव संसार और पंचतत्व के साथ


वर्ष 1983 से, पीके शेरपा ने सजीव और निर्जीव संसार को केवल देखने या समझने की वस्तु नहीं माना, बल्कि इसे अपने जीवन के अनुभवों, चेतना और कर्म का आधार बनाया। प्रारंभ से ही उन्होंने पर्वत, हिम, जल, जंगल, मिट्टी, वायु, आकाश, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और समस्त जीव-जगत के बीच मौजूद गहरे संबंध को निकटता से महसूस किया।
उनकी समझ में सजीव और निर्जीव संसार केवल मनुष्यों की दुनिया नहीं है, बल्कि यह सभी जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, प्रकृति और व्यापक ब्रह्मांड का साझा घर है। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पेड़-पौधे, नदियां, पर्वत, जंगल और मिट्टी—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक के संतुलन में होने वाला परिवर्तन पूरे जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकता है।
प्राकृतिक संसार के इस मूल संबंध को समझते हुए पीके शेरपा ने पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के महत्व को भी अपनी जीवनभर की पर्यावरणीय चेतना से जोड़ा और इस समझ को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया।
पृथ्वी हमारा आधार है, जो हमें रहने का स्थान, भोजन और वनस्पतियों तथा जीवन के विकास के लिए भूमि प्रदान करती है।
जल जीवन का स्रोत है, जो प्रत्येक जीव और वनस्पति को जीवित रखता है।
अग्नि ऊर्जा और प्राकृतिक शक्तियों के संतुलन का प्रतीक है।
वायु प्रत्येक जीव की सांस और जीवन से जुड़ा अनिवार्य तत्व है।
आकाश/अंतरिक्ष वह विशाल प्राकृतिक विस्तार है, जो पूरे सजीव और निर्जीव संसार को अपने भीतर समेटे हुए है।
जब तक ये पांचों तत्व संतुलित रहते हैं, तब तक प्रकृति और जीवन का चक्र स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है। पृथ्वी के प्रदूषित होने, जलस्रोतों के सूखने या दूषित होने, वायु के प्रदूषण, प्राकृतिक ऊर्जा के असंतुलन तथा वातावरण में होने वाले बदलावों का प्रभाव अंततः पूरे सजीव और निर्जीव संसार पर पड़ता है।
इसी गहरे अनुभव और समझ से पीके शेरपा का जीवन संदेश और अभियान का नारा सामने आया:

“आइए प्रकृति की रक्षा करें, जलवायु परिवर्तन को कम करें और पृथ्वी के बढ़ते तापमान को कम करने में योगदान दें।”

यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि चार दशक से अधिक लंबे अनुभव, प्रकृति के साथ गहरे संबंध और समस्त सजीव एवं निर्जीव संसार के प्रति जिम्मेदारी की भावना से उत्पन्न जागरूकता का संदेश है।
जब प्रकृति का विनाश होता है, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अधिक गंभीर हो जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और हिम पिघलने लगते हैं, जलस्रोत प्रभावित होते हैं, जंगल और जैव-विविधता खतरे में पड़ते हैं, वायु प्रदूषित होती है और पृथ्वी का प्राकृतिक तापमान संतुलन बिगड़ता है। इसका प्रभाव केवल मनुष्यों पर नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और संपूर्ण प्राकृतिक संसार पर पड़ता है।
इसी प्राकृतिक चक्र से जुड़ा पीके शेरपा का एक और महत्वपूर्ण जीवन-दर्शन है:

“जहां बर्फ है, वहां पानी है; जहां पानी है, वहां जीवन है।”

बर्फ की रक्षा का अर्थ भविष्य के जल की रक्षा करना है। जल की रक्षा का अर्थ जीवन की रक्षा करना है। और जीवन की रक्षा का अर्थ पंचतत्वों के संतुलन तथा पूरे सजीव और निर्जीव संसार के भविष्य की रक्षा करना है।
इसीलिए वर्ष 1983 से, पीके शेरपा ने प्रकृति संरक्षण को केवल भाषणों, विचारों या नारों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, कचरा प्रबंधन, जलस्रोत संरक्षण, पर्वतीय संरक्षण, जैव-विविधता संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति जनजागरूकता अभियानों के माध्यम से इसे व्यवहार में उतारने का प्रयास किया।
पीके शेरपा की चार दशक से अधिक लंबी यात्रा केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं है। यह जागरूकता और प्रकृति से पुनः जुड़ने की यात्रा है—लोगों को प्रकृति के करीब लाने, मानवता को पंचतत्वों के महत्व की याद दिलाने और समस्त सजीव एवं निर्जीव संसार के प्रति साझा जिम्मेदारी की भावना जगाने की यात्रा है।
आज उनका संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है:
आइए पंचतत्वों के संतुलन की रक्षा करें।
आइए समस्त सजीव और निर्जीव संसार का संरक्षण करें।
आइए प्रकृति की रक्षा करें।
आइए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करें और पृथ्वी के बढ़ते तापमान को कम करने में अपने स्तर पर योगदान दें।

“आइए प्रकृति की रक्षा करें, जलवायु परिवर्तन को कम करें और पृथ्वी के बढ़ते तापमान को कम करने में योगदान दें।”

इसी नारे, जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना के साथ 1983 में शुरू हुई पीके शेरपा की प्रकृति संरक्षण यात्रा आज भी जारी है—सजीव और निर्जीव संसार की रक्षा, पंचतत्वों के संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए।

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