प्रकृति संरक्षण अभियानकर्ता पी.के. शेरपा की ओर से संपूर्ण मानव समाज के नाम एक अपील

“मैं प्रकृति के बारे में अल्पकालीन अनुभव के आधार पर बात नहीं कर रहा हूँ।”

मैं, प्रकृति संरक्षण अभियानकर्ता पी.के. शेरपा, वर्ष 1983 से लगातार प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हूँ। बचपन से ही मैंने अपना जीवन प्रकृति, जंगलों, जल, पहाड़ों और संपूर्ण जीव-जगत की रक्षा के लिए समर्पित किया है।चार दशकों से अधिक की इस यात्रा के दौरान मैंने अपने जीवन को प्रकृति से जुड़ी एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह जिया है। नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों से लेकर विश्व के अलग-अलग हिस्सों तक मुझे प्रकृति में हो रहे बदलावों को नजदीक से देखने, समझने और उसके संरक्षण के लिए अपनी आवाज उठाने का अवसर मिला है।यह यात्रा कभी आसान नहीं रही। पहाड़ों, जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में प्रकृति संरक्षण के कार्य के दौरान मुझे 10 बार अत्यंत जीवन-घातक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और सौभाग्य से मैं हर बार सुरक्षित बच सका। इन अनुभवों ने मुझे जीवन और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को और अधिक गहराई से समझने में सहायता की।इसीलिए आज जब मैं प्रकृति संरक्षण की बात करता हूँ, तो यह केवल पुस्तकों में पढ़ी हुई बातों या कुछ वर्षों के अनुभव के आधार पर नहीं है। मैं प्रकृति की गोद में बिताए चार दशकों से अधिक समय, अपनी आंखों से देखे गए बदलावों और जीवन द्वारा सिखाए गए अनुभवों के आधार पर अपनी बात रख रहा हूँ।

इसीलिए आज मैं संपूर्ण मानव समाज से एक विनम्र, लेकिन गंभीर अपील करना चाहता हूँ—कृपया अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति द्वारा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के बीच बनाए गए प्राकृतिक क्रम और संतुलन को नष्ट न करें।आज जब हम लगातार प्रकृति के संतुलन के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं, तो उसके परिणाम हमारी आंखों के सामने तेजी से दिखाई दे रहे हैं। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है और ग्लेशियर तथा हिमनद झीलें लगातार अधिक संवेदनशील होती जा रही हैं। इसके परिणामस्वरूप बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएं मानव बस्तियों, संपत्तियों और सभी जीव-जंतुओं के जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल रही हैं।

वन्यजीव, वनस्पतियां और प्रकृति पर निर्भर जीवन का हर रूप बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है।यह केवल मेरी व्यक्तिगत राय नहीं है। यह चार दशकों से अधिक समय तक प्रकृति के साथ सीधे जुड़कर किए गए कार्य, अपनी आंखों से देखे गए बदलावों तथा जीवन के कठिन अनुभवों से निकली एक गंभीर चेतावनी है।मानव समाज का विकास आवश्यक है, लेकिन प्रकृति को नष्ट करके नहीं।

हमें सतत और टिकाऊ विकास का रास्ता अपनाना होगा तथा जंगलों, जलस्रोतों, स्वच्छ वायु, पहाड़ों और सभी प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनी होगी। आज हम प्रकृति के साथ जो अन्याय कर रहे हैं, उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।इसलिए संपूर्ण मानवता से

मेरी हृदय से अपील है—आइए, प्रकृति द्वारा बनाए गए प्राकृतिक क्रम को नष्ट न करें।आइए, पर्वतों की बर्फ, जलस्रोतों, जंगलों और स्वच्छ हवा की रक्षा करें।आइए, केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि संपूर्ण जीव-जगत की रक्षा की जिम्मेदारी उठाएं।

आइए, प्रकृति के विरुद्ध युद्ध न करें, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व का मार्ग अपनाएं।आज के विकास के साथ-साथ हमें आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के बारे में भी सोचना होगा।«

“जहाँ बर्फ है, वहाँ पानी है; जहाँ पानी है, वहाँ जीवन है।”

»आइए, प्रकृति की रक्षा करें, जलवायु परिवर्तन को कम करने के प्रयास करें और पृथ्वी के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के लिए मिलकर कार्य करें। आज प्रकृति की रक्षा करके ही हम आने वाले कल में मानव सभ्यता और संपूर्ण जीव-जगत की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।चार दशकों से अधिक के मेरे अनुभव ने मुझे एक मूलभूत सत्य सिखाया है—मनुष्य प्रकृति से बड़ा नहीं है; मनुष्य स्वयं प्रकृति का ही एक हिस्सा है।इसलिए प्रकृति की रक्षा करना, अंततः मानव सभ्यता और पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीवन की रक्षा करना है।

आइए, आज से ही जागरूक बनें।आइए, प्रकृति की आवाज सुनें।आइए, प्रकृति की रक्षा करें।

आइए, भविष्य को सुरक्षित करें।

पी.के. शेरपाप्रकृति संरक्षण अभियानकर्तावर्ष 1983 से लगातार प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!