मुंगेली में हरछठ-कमरछठ पर महिलाओं ने विधि-विधान से की पूजा, बाजारों में रही रौनक
मुंगेली। संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना को लेकर मनाया जाने वाला पारंपरिक हलषष्ठी व्रत (हरछठ-कमरछठ) बुधवार को जिलेभर में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताओं ने अपनी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार उपवास रखा और हलषष्ठी माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर संतान के सुखद एवं स्वस्थ जीवन की कामना की।
बाजारों में रही रौनक
हलषष्ठी पर्व को लेकर सुबह से ही शहर के बाजारों में चहल-पहल रही। पूजा सामग्री की दुकानों पर महिलाओं की भीड़ नजर आई। व्रत और पूजन के लिए महुआ, पसई-पसहर चावल, ज्वार की धानी, मिट्टी के बर्तन और विभिन्न प्रकार की मौसमी भाजियों की खरीदारी की गई। छत्तीसगढ़ की कमरछठ परंपरा में छह प्रकार की भाजियों का विशेष महत्व माना जाता है। महिलाओं ने चरोटा, खट्टा, चेंच, मुनगा, कुम्हड़ा, लाल भाजी और चौलाई सहित उपलब्ध मौसमी भाजियों का उपयोग पूजा में किया।
पारंपरिक सामग्री से हुई पूजा
हलषष्ठी पर्व पर कई स्थानों पर छह प्रकार की सामग्री, अन्न, वस्त्र और अन्य पूजन सामग्री का भी उपयोग किया गया। पारंपरिक मान्यता के अनुसार इस दिन हल से जुते खेत की उपज का उपयोग नहीं किया जाता। इसके स्थान पर पसई-पसही चावल, महुआ और जलाशयों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली वस्तुओं को पूजा में शामिल किया जाता है। कई क्षेत्रों में परंपरा के अनुसार गाय के दूध-दही के स्थान पर भैंस के दूध, दही और घी का उपयोग भी किया गया।
संतान के स्वस्थ जीवन की कामना
व्रती महिलाओं ने पूजा-अर्चना के बाद हलषष्ठी माता की कथा सुनी। इसके बाद संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना की। महिलाओं ने दिनभर व्रत रखकर पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया। घरों और पूजा स्थलों पर महिलाओं ने समूह में पूजा-अर्चना कर पर्व की धार्मिक एवं पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
हलषष्ठी व्रत छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और पारंपरिक संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें मातृत्व की भावना के साथ परिवार की खुशहाली और संतान के मंगलमय जीवन की कामना की जाती है।
