नेपाल। ख्वोप कॉलेज ऑफ लॉ के विद्यार्थियों के साथ जलवायु न्याय पर काव्यिक संवाद, भोटेकोशी बाढ़ ने बढ़ाई चिंतानेपाल। ख्वोप कॉलेज ऑफ लॉ के विद्यार्थियों के साथ जलवायु न्याय, सामाजिक न्याय और बदलते पर्यावरणीय संकट को लेकर एक विचारोत्तेजक एवं काव्यात्मक संवाद हुआ। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अपनी कविताओं और विचारों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के सामाजिक, मानवीय और कानूनी प्रभावों को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।इस दौरान भोटेकोशी में आई भयावह बाढ़ और उससे प्रभावित जनजीवन का भी उल्लेख किया गया।

बाढ़ में बहती पीड़ा, लोगों की चीख-पुकार, तबाही और उसके बीच बची उम्मीद ने जलवायु संकट की गंभीरता को एक बार फिर सामने ला दिया।विशेषज्ञों और विद्यार्थियों के बीच चर्चा में कहा गया कि विश्व के अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले औद्योगिक देशों की गतिविधियों के कारण जलवायु परिवर्तन तेजी से बढ़ रहा है। इसका असमान प्रभाव नेपाल जैसे कम कार्बन उत्सर्जन वाले देशों पर पड़ रहा है।हिमालय क्षेत्र, जिसे विश्व के प्रमुख जल स्रोतों में गिना जाता है, आज तेजी से बढ़ते तापमान, हिमनदों के पिघलने और हिमतालों के फटने के बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है। इसके प्रत्यक्ष प्रभाव नेपाल की नदियों, कृषि, बस्तियों, आधारभूत संरचनाओं और आम जनजीवन पर दिखाई देने लगे हैं। भोटेकोशी की हालिया बाढ़ ने जनधन और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के माध्यम से जलवायु संकट की भयावहता की गंभीर चेतावनी दी है।चर्चा में यह महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया गया कि जब नेपाल का वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, तो फिर जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत नेपाल जैसे देशों को क्यों चुकानी पड़ रही है? ऐसे में पीड़ित देशों को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण जलवायु क्षतिपूर्ति, तकनीकी सहयोग और आर्थिक सहायता के लिए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मांग रखनी चाहिए।कार्यक्रम में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि जलवायु न्याय केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार, कानूनी दायित्व और अंतरपीढ़ीगत न्याय का भी महत्वपूर्ण प्रश्न है। आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए आज की पीढ़ी को जलवायु संकट के खिलाफ जागरूक और सक्रिय भूमिका निभानी होगी।विद्यार्थियों की कविताओं में भी सामाजिक न्याय, जलवायु संकट और उससे जुड़ी कानूनी चुनौतियों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया गया। उनकी रचनाओं ने यह संदेश दिया कि प्रकृति की रक्षा केवल सरकारों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक और विशेषकर नई पीढ़ी की सामूहिक जिम्मेदारी है।कार्यक्रम का मूल संदेश यही रहा कि आज उठाई गई जागरूक आवाज, कानूनी वकालत और सामूहिक प्रयास ही आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को रहने योग्य बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।“भोटेकोशी की बाढ़ में सुनाई दी तबाही की चीख, लेकिन उसी के बीच जलवायु न्याय की उम्मीद भी दिखाई दी।”
